Monday, June 12, 2023

सवाई जयसिंह का इतिहास और जीवन परिचय

 नाम सवाई जयसिंह द्वितीय

अन्य नाम विजयसिंह (मूल नाम)

जन्म 3 नवम्बर, 1688 ई.

जन्म भूमि आमेर

मृत्यु तिथि 21 सितम्बर 1743 ई.

पिता/माता पिता- राजा बिशनसिंह

माता- रानी इन्द्रकुंवरी


धार्मिक मान्यता हिन्दू

प्रसिद्धि राजपूत शासक

संबंधित लेख मुग़ल वंश, औरंगज़ेब, राजपूत साम्राज्य, राजपूत, राजपूताना, आमेर, राजस्थान का इतिहास

विशेष सवाई जयसिंह संस्कृत और फ़ारसी भाषा का विद्वान होने के साथ गणित और खगोलशास्त्र का असाधारण पण्डित था।



अन्य जानकारी सवाई जयसिंह मालवा और बाद में आगरा में बादशाह का प्रतिनिधि नियुक्त हुआ था। बाजीराव प्रथम के साथ उसके मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे। मुग़ल साम्राज्य के खण्डहरों पर 'हिन्दू पद पादशाही' की स्थापना करने के पेशवा के लक्ष्य से उसे सहानुभूतितब उन्होंने राज्यघरानों के लिये तथा समस्त राजपूत जाति के लिये नियम बना दिये। और उन नियमों को अपने राज्य में प्रचलित कर दिया, जिनसे विवाह ओर श्राद्ध के समय में कम खर्च हो। इस कार्य से महाराज जय सिंह जी ने अनुकरणीय आदर्श उपस्थित कर राजपूत जाति की जो भलाई की, वह अवर्णनीय है। टॉड साहब लिखते हैं “इस महापुरुष ने समाज सम्बन्धी जो संस्कार किये, उनका अनुष्ठान करना अत्यन्त आवश्यक है। महाराज सवाई जय सिंह जी सभी जातियों पर एक से दयावान थे। क्या ब्राह्मण क्या मुसलमान, क्या जैन सभी को समान दृष्टि से देखते थे। जैनियों को ज्ञान शिक्षा में श्रेष्ठ जानकर जयसिंहजी उन पर अत्यन्त अनुग्रह रखते थे। ऐसा भरी प्रकट होता है कि उन्होंने जैनियों के इतिहास और धर्म के सम्बन्ध में स्वयं शिक्षा प्राप्त की थी। उनके

वैज्ञानिक तत्व की आलोचना में विद्याधर नामक जो पंडित सबसे अग्रगण्य था, और जिसके प्रभा-बल से जयपुर नगर की सृष्टि हुईं, वह जैन- धर्मावलम्बी विख्यात है।


सवाई जयसिंह जी का कला-प्रेम

महाराज सवाई जयसिंह जी कला-कौशल्य के बड़े प्रेमी थे। उन्होंने इसे बड़ा उत्तेजन दिया। वे इसके रहस्य को भी भली प्रकार जानते थे। वर्तमान जयपुर नगर जो भारत में सब से अधिक सुन्दर है, इन्हीं महाराजा के कला-प्रेम का फल है। इसमें नगर निर्माण कला (Town Planning) का उच्च आदर्श प्रगट होता है। विश्व प्रसिद्ध नगर निर्माण विद प्रो० गिडिज महोदय तो इस नगर को देखकर विमोहित हो गये थे। उन्होंने अपने ( Town Planning in India) नामक ग्रंथ में लिखा है “जयपुर न केवल नगर निर्माण

कला के उच्चध्येय को प्रगट करता है, पर नागरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी वह अनुपम है।


सवाई जयसिंह जी का राजनितिक जीवन

अभी तक हमने महाराज सवाई जयसिंहजी के जीवन की विविध गतिविधियों पर प्रकाश डालने की चेष्टा की है। अब हम उनके राजनीतिक जीवन पर दो शब्द लिखना उचित समझते हैं। राज्य गद्दी पर बैठने के समय महाराजा सवाई जय सिंह जी की अवस्था केवल ग्यारह वर्ष की थी। आपने दक्षिण में बादशाह औरंगजेब के साथ कई युद्धों में रहकर अच्छी ख्याति प्राप्त की थी। इसी से आपको “सवाई” की सम्मान-सूचक उपाधि मिली थी। जब बादशाह औरंगजेब ने राजकुमार आज़मशाह के पुत्र बेदारबख्त को गुजरात का सूबेदार नियुक्त किया था, उस समय उसने महाराज सवाई जयसिंह जी को उसके साथ भेजा था। ये दोनों हम उम्र थे इसलिये इनमें प्रगाढ़ प्रीति हो गई थी। संवत्‌ 1764 में औरंगजेब के मरने पर जब उसके पुत्रों में राज-सिंहासन के लिये बखेड़ा हुआ तब जयसिंह जी ने बेदारबख्त और उसके पिता आजम शाह का पक्ष ग्रहण किया था।


आजमशाह और बेदारबख्त ने राज्य-सिंहासन पाने की आशा से जब सेना सहित दिल्‍ली की ओर कूच किया था तब महाराज जय सिंह जी भी उनके साथ थे। उस ओर काबुल से औरंगजेब का बड़ा बेटा बहादुरशाह भी अपनी फौज के साथ दिल्‍ली जा रहा था। रास्ते में दोनों फौजों में मुठभेड़ हो गई। घसासान युद्ध हुआ। इसमें आज़मशाह और बेदारबख्त दोनों मारे गये और सवाई जयसिंह जी भी घायल हुए। फिर कया था, विजयी बहादुरशाह बे खटके होकर दिल्‍ली के सिंहासन पर बैठ गया। उसने बादशाही खिताब धारण करते ही सवाई जयसिंह जी से बदला लेने की ठानी। उसने आमेर के राज्य को खालसा करने के लिये सेना भेजी, पर जय सिंह जी ने इस सेना के दाँत खट्टे कर इसे अपने राज्य से बाहर निकाल दिया। इसके थोड़े ही दिन बाद जब बादशाह बहादुरशाह कासबरूश पर चढ़ाई करने के लिये दक्षिण की ओर जा रहा था तब रास्ते में आमेर पहुँच कर उसने उस पर खालसा बैठाना चाहा । कई कारणों से इस वक्त सवाई जयसिंह जी ने बादशाह का मुकाबला करना उचित नहीं समझा। वे खुद अपनी सेना सहित बादशाही फौज के साथ दक्षिण की ओर रवाना हो गये। मार्ग में बादशाह ने धोखा देकर जोधपुर पर खालसा बैठा दिया और उसने वहाँ के तत्कालीन महाराज अजित सिंह जी को सेना सहित अपने साथ ले लिया।


महाराज सवाई जयसिंह जी और महाराज अजित सिंह जी नर्मदा नदी तक बहादुरशाह के साथ साथ गये। अभी तक इन दोनों को यह आशा थी कि हम किसी तरह बादशाह को प्रसन्न कर लेंगे। पर जब उनकी इस आशा के फलवती होने के कुछ भी चिन्ह दिखलाई न देने लगे, तब वे बादशाह की अनुमति लिये बिना ही वहां से लौट पड़े और उदयपुर आ गये। उदयपुर में महाराणा अमर सिंह जी ने इन दोनों नृपतियों का बड़ा सत्कार किया। अब इन तीनों ने मिलकर अपना सुसंगठित गुट बनाना चाहा। इन तीनों नृपतियों ने अपने सम्बन्ध को और भी सुदृढ़ करना चाहा। राणाजी न जयसिंह जी के साथ अपनी पुत्री का और अजित सिंह जी के साथ अपनी बहिन का विवाह-सम्बन्ध स्थिर किया। इसके अतिरिक्त तीनों ने मिलकर यह निश्चय किया कि अगर किसी एक पर दिल्‍ली के बादशाह का दबाब पड़ेगा तो शेष दोनों उसकी मदद करेंगे। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस एकता का प्रभाव बहादुरशाह पर बहुत ही पड़ा। महाराणा अमर सिंह जी ने दोनों महाराजाओं को अपना अपना राज्य वापस प्राप्त कर लेन के लिये सहायता दी और इसमें सफलता भी हुई। महाराज सवाई जयसिंह जी ने आमेर और महाराज अजित सिंह जी ने जोधपुर पर फिर से अपना अधिकार कर लिया।


यह ख़बर सुनकर बादशाह बहादुरशाह बहुत क्रोधित हुआ और वह एक बड़ी सेना के साथ राजपूताने पर चढ़ आया। पर ज्योंही वह अजमेर पहुँचा त्योंही उसे यह खबर लगी कि उदयपुर, जयपुर और जोधपुर के राजा आपस में मिल गये हैं। इनकी संयुक्त शक्ति का मुकाबला करना जरा टेढ्रीखीर है। बस, बहादुरशाह ने जयपुर और जोधपुर पर चढ़ाई करने के विचार को त्याग दिया। इसी बीच में बादशाह को खबर लगी कि पंजाब में सिक्खों ने सर उठाया है, तब तो उसकी स्थिति और भी बेढब हो गई। अब तो उसे जयपुर और जोधपुर के महाराजाओं को प्रसन्न करने की आवश्यकता प्रतीत हुईं । सम्वत्‌ 1767 में उसने दोनों महाराजाओं को अजमेर के डेरे पर बुलाये और उनकी बड़ी खातिर की।

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